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इलाहाबाद

तिरंगा बनाना आसान नहीं, काफी सख्त हैं नियम, जानिए कहां और कैसे बनता है तिरंगा

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भारत का राष्ट्रीय ध्वज देश का गौरव है। यह देश के नागरिकों की उम्मीद और आकांक्षाओं का प्रतीक है। अगर आप सोचते हैं कि भारत का तिरंगा झंडा हर कोई बना सकता है तो आप बिल्कुल गलत सोचते हैं। आपको बता दें कि जिस तरह से देश को आजादी आसानी से नहीं मिली।

ठीक उसी प्रकार से देश का राष्ट्रीय ध्वज भी आसानी से तैयार नहीं किया जा सकता। 1950 में जब भारत गणतंत्र हुआ। उसके बाद भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने 1951 में पहली बार ध्वज की कुछ विशेषताएं बताईं। 1964 में इसमें संशोधन किया गया।

आपको बता दें कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज बनाने से संबंधित दिशा निर्देश काफी कड़े हैं और झंडा बनाने में किसी प्रकार का कोई दोष एक गंभीर अपराध समझा जाता है। इसके लिए अपराधी को जुर्माना या जेल या दोनों सजाएं भी हो सकती हैं। 

आपको बता दें कि ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड यानी बीआईएस द्वारा राष्ट्रध्वज को तैयार करने सम्बंधित तीन दस्तावेज जारी किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सभी झंडे खादी के सिल्क या कॉटन के होंगे। झंडे बनाने का मानक 1968 में तय किया गया।

जिसे 2008 में फिर से संशोधित किया गया। तिरंगे के लिए नौ स्टैंडर्ड साइज तय किए गए हैं। सबसे बड़ा झंडा 21 फीट लंबा और 14 फीट चैड़ा होता है। 
तिरंगा बनाने के लिए सबसे पहले बैंगलुरू के बगालकोट जिले में खादी ग्रामोद्योग सयुक्त संघ के द्वारा कपड़े को बहुत ध्यान से काता और बुना जाता है।

इसके बाद कपड़े को तीन अलग-अलग लॉट बनाए जाते हैं। इसके बाद तिरंगे के तीन अलग-अलग रंगो में डाई किया जाता है। डाई किए हुए कपडों को बैंगलुरू के हुबली इकाई में भेजा जाता है। यहाँ इन्हें अगल-अलग आकार में काटा जाता है। हुबली में ही इन्हें सिला भी जाता।

यहाँ लगभग 40 महिलाएं प्रतिदिन 100 के करीब झंडे सिलती हैं। कटे हुए सफेद कपड़े पर चक्र प्रिंट किया जाता है। इसके बाद तीनों रंग के कपड़े की सिलाई की जाती है। सिलाई के बाद इसे प्रेस किया जाता है। फिर तिरंगे को आगे भेजा जाता है।

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