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इलाहाबाद

जैविक हथियार से क्यों डरी है पूरी दुनिया, चीन क्यों है पूरी दुनिया के निशाने पर, जानिये युद्ध में इसके उपयोग पर क्यों है प्रतिबन्ध

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गलवां घाटी में भारत और चीन के सैनिकों में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। दोनों देशों की सीमाओं पर तोप और हथियारों के साथ सैनिकों की गतिविधियां तेज हो गयी हैं। 

वहीं वुहान शहर से शुरू हुए कोरोना के कारण आज चीन पूरी दुनियां की निगाह में चढ़ गया है। अमेरिका ने तो चीन पर खुल कर जैविक हथियार बनाने का आरोप तक लगा दिया है। इसके साथ ही एक बार फिर जैविक हथियार बनाने और उपयोग की चर्चा पूरी दुनिया में तेज है।

वो हथियार जिससे पूरी दुनिया डरती है। परमाणु बम की तरह ही इसे भी खतरनाक माना जाता है।
चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना वायरस का कहर आज पूरी दुनिया झेल रही है।

अब तक पूरी दुनिया में एक करोड़ लोग इस महामारी की चपेट में आ चुके हैं। इसमें मरने वालों की संख्या करीब 4 लाख 80 हजार तक पहुंच गई है। जबकि भारत में  कोरोना संक्रमितों की संख्या 4 लाख 40 हजार के पार पहुंच गई है और मरने वालों की संख्या करीब 14 हजार हो गयी है।

जिसे चीन के वुहान शहर की प्रयोगशाला में तैयार किया जा रहा था और थोड़ी सी लापरवाही के चलते आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी के निशाने पर है। सभी देश आज इनकी वैक्सीन बनाने में जुट गए हैं लेकिन अभी तक स्पष्ट रूप से सफलता हाथ नहीं लगी है।

कोरोना महामारी के इस खतरनाक रूप को जैविक हथियार के रूप में समझा जा सकता है। हालांकि  कई देश कोरोना वायरस चीन द्वारा तैयार किये जा गए जैविक हथियार के रूप में ही देखते हैं। 

कोरोना के कारण आज चीन पूरी दुनिया की निगाहों में खटक ने लगा है। छुआछूत की इस बीमारी से आज सभी देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। छुआछूत से फैलने वाली कोरोना महामारी को अगर जैविक हथियार का एक रुप कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जैविक हथियार बैक्टीरिया, वायरस, फंगी और अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों तत्वों से जो तेजी से पैदा होते हैं। जैविक हथियार का उपयोग मुख्य रूप से इंसान के साथ साथ जानवरों व पेड़-पौधों, समुदाय विशेष को खत्म करने के लिए किया जाता है।

जैविक हथियार काफी तेजी से संबंधित क्षेत्र में महामारी का विकराल रूप धारण करता। इसकी चपेट में आने के बाद तेजी से लोगों की मौत होने लगती ही। चपेट में आने वाले बड़े-बड़े समुदाय तेजी से खत्म हो जाते हैं।


जैविक हथियार के ये हैं किस्से

प्रचीनकाल में जैविक हथियार के अलग अलग रूप दिखते थे। जैसे पहले लोग किसी समुदाय या कबीले को खत्म करने के लिए जानवर मार कर कुंए या तालाब में फेंक देते थे। जिससे वहां महामारी फैल जाती थी और लोगों की मौत होने लगती थी।

साइबेरिया में घुमन्तू कबीले के लोग जैविक हथियार के रूप में मरे हुए व्यक्ति के खून को तीर में लगा कर दुश्मन को मारने में करते थे। राजा हन्नीबाल ने यूरीमेडान के युद्ध को जीतने के लिए दुश्मन सेना की जहाज पर जहरीले सांपों को फेका था और युध्द में जीत हासिल की थी।

14वीं शताब्दी में तो काफा शहर को जीतने के लिए टटार सैनिकों ने दुश्मनो पर प्लेग से संक्रमित लोगों की लाशें शहर की गलियों में फेंके थे। ताकि शहर में प्लेग की महामारी फैल जाए।

इसके अलावा ऐसा माना जाता है कि जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कालरा, एन्थ्रेक्स, गेहूं के फंगज से तैयार जैविक हथियार का उपयोग किया था। रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में प्लेग फैलाने का आरोप जर्मनी पर ही हैं।

1925 में लगा जैविक हथियार पर प्रतिबंध

जैविक हथियार के घातक रूप को देखते हुए 1925 में जेनेवा प्रोटोकॉल पर 108 देशों ने हस्ताक्षर कर इस पर प्रतिबंध लगाने पर  सहमति जाहिर की थी। जिसके तहत कोई देश जैविक हथियार ना तो बनाएगा और ना ही उपयोग करेगा। बावजूद इसके आज भी नियमों को ताक पर रख कर अलग-अलग देशों में जैविक हथियारों के तैयार होने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते रहे हैं

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