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राजनीति

पंचायत चुनाव:कोरोना के खलल के बीच चुनाव में ताल ठोकने की तैयारी शुरू, जानिए कोरोनाकाल में चुनावी रणनीति

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उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनाव पर कोरोनाकाल का ग्रहण साफ दिखाई दे रहा है। इसके कारण अभी तक पंचायत चुनाव को लेकर चुनाव आयोग या सरकार की ओर से कुछ भी स्पष्ट नहीं किया गया है। चुनाव कब होंगे, किस पंचायत क्षेत्र की सीट आरक्षित होगी और कौन अनारक्षित सीट होगी ? इसकी भी घोषणा तक नहीं की गई है।

बावजूद इसके इस बार पंचायती चुनाव में ताल ठोकने का मन बना चुके लोग पिछली सीटों के आधार पर आरक्षित और अनारक्षित सीटों का समीकरण बैठा कर चुनाव प्रचार की तैयारियों में जुट गए हैं। गांव के चौराहों, पान की गुमटी, चाय की दुकान से लेकर खेत खलिहानों तक चुनावी चर्चा तेज हो गई है।

किस गांव में कौन सी सीट आएगी और कौन कौन चुनाव लड़ने के लिए कमर कस रहा है? ये साफ दिखने लगा है। पिछले चुनाव में हारे और जीते प्रत्याशियों पर भी चर्चा हो रही है। इन सबके बीच चुनाव कब होंगे? यह यक्ष प्रश्न भावी प्रत्याशियों पर भारी आर्थिक चोट पहुंचा रहा हैं।

उन्हें डर है कि चुनाव कहीं ज्यादा समय के लिए पीछे गया तो उनका व्यवहारिक चुनावी बजट गड़बड़ा जाएगा। ऐसे में कुछ लोग पैसा खर्च करने के बजाय जुबानी तालमेल की रणनीति पर ज्यादा बल दे रहे हैं।

कहीं जातीय तो कहीं पैसे के दम पर बन रहा समीकरण

पंचायत चुनाव में ताल ठोकने का मन बनाने वाले ज्यादातर वो प्रत्याशी हैं, जो पिछले चुनाव में कुछ वोटों के अंतर से शिकस्त खानी पड़ी थी। इस बार उनकी दावेदारी काफी मजबूत भी है। इसलिए वो किसी भी हाल में पीछे हटना नहीं चाहते।

सीटें बदली तो वो अपना प्रत्याशी तक तय कर चुके हैं। वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो पिछले पांच सालों से चुनावी माहौल तैयार कर रहे थे। चुनाव जीतने के लिए जातीय समीकरण, पैसा और रूतबा दिखाने में भी कोई पीछे नहीं हैं।

हालांकि जातीय समीकरण पर ज्यादातर प्रत्याशी अपनी गोटियां सेट कर रहे हैं। जातीय समीकरण में जोड़तोड़ की राजनीति शुरू हो चुकी है। किसी की लंबे परिवार पर निगाहें टिकी हैं तो कोई छोटे छोटे परिवार के दम पर अपनी जीत देख रहा है।

वहीं जो प्रधान इस बार फिर से चुनाव में ताल ठोकने का मन बना रहे हैं, वह कोशिश में लगा है कि कोई उसके काम से नाराज ना हो। जो प्रधान कभी कोटेदार के खिलाफ ग्रामीणों की एक शिकायत तक नहीं सुनते थे, वो ग्राम प्रधान कोटेदारों के खिलाफ बगावत तक करते नजर आ रहे हैं।

चुनाव प्रचार में कोरोना का खलल

शहर के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी कोरोना तेजी से अपना पांव पसार चुका है। इसके कारण लोग पिछली बार की अपेक्षा इस बार चुनाव प्रचार के लिए ठीक से नहीं निकल पा रहे हैं। लोगों के घरों पर आना जाना कम ही हो पा रहा है। बावजूद इनके ज्यादा से ज्यादा सम्पर्क बना रहे हैं। गांव में लोगों के घर बैठने के बजाय दूर से बात हो रही है। नमस्कार, दुआ सलाम हो रहा है। हालांकि मोबाइल से लोगों के बीच अपनी चुनावी छवि जरूर तैयार की जा रही है।

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