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उत्तरप्रदेश

हाईकोर्टः मां-बाप, पत्नी और संतान को देना होगा गुजारा भत्ता, भरण पोषण करना पति की वचनबद्धता, विधिक, नैतिक, सामाजिक जिम्मेदारी

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और पुत्री को प्रतिमाह भरण-पोषण देने के परिवार न्यायालय झांसी के आदेश को वैध करार देते हुए कहा कि माता-पिता, पत्नी व संतान का भरण पोषण करना कल्याणकारी धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक विधान के तहत सामाजिक न्याय की संकल्पना होती है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में विवाह महत्वपूर्ण है। माता-पिता का सपना होता है कि बेटी को ससुराल में मायके से अधिक प्यार व सुख मिले। जब बेटी पर जुल्म होता है तो मां-बाप के सपने टूटने जैसा है और उन्हें गहरा सदमा लगता है। हिन्दुओं में विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान है। बेटी दूसरे को सौंप दी जाती है। उसका भरण पोषण करना न केवल विधिक, नैतिक व सामाजिक जिम्मेदारी है बल्कि विवाह में की गई पति की वचनबद्धता भी है। परिवार न्यायालय झांसी द्वारा 35 सौ रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने के आदेश को वैध करार देते हुए कोर्ट ने आदेश की वैधता को चुनौती देनी वाली याचिका खारिज कर दी है। लगातार हिन्दी भाषा में फैसला सुना रहे न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने यह आदेश अश्वनी यादव की याचिका पर दिया है। इस मुकदमें में परिवार न्यायालय ने पति अश्वनी को पत्नी को 2500 रुपये और पुत्री को 1000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है। 

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